ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच बढ़ते युद्ध ने पूरे एशिया में हलचल पैदा कर दी है, जिससे ईंधन की कमी, आर्थिक व्यवधान और ऊर्जा संकट गहरा गया है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा गलियारों में से एक ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) के आसपास बढ़ते तनाव के कारण कई एशियाई देश ईंधन आपूर्ति सुरक्षित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
भारत पर प्रभाव: भारत में इस संघर्ष का सीधा असर दैनिक जीवन पर दिख रहा है। होर्मुज मार्ग से होने वाली शिपमेंट में बाधा के कारण रसोई गैस (LPG) की आपूर्ति कम हो गई है। होटल और छोटे खाद्य व्यवसाय सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं, क्योंकि वाणिज्यिक एलपीजी सिलेंडर मिलना कठिन होता जा रहा है। मुंबई, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे शहरों में कुछ व्यवसायों ने बिजली के उपकरणों या कोयले के चूल्हों का उपयोग करना शुरू कर दिया है। भारत अपनी रसोई गैस का लगभग 60 प्रतिशत आयात करता है, जिसका बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है।
एशिया के अन्य देशों का हाल:
- जापान: बाजार स्थिरता बनाए रखने के लिए अपने रणनीतिक तेल भंडार से लाखों बैरल तेल जारी कर रहा है।
- दक्षिण कोरिया: ईंधन की कीमतों पर ‘प्राइस कैप’ लागू कर दिया गया है।
- बांग्लादेश और पाकिस्तान: ईंधन की राशनिंग शुरू की गई है और ऊर्जा बचाने के लिए कार्य सप्ताह को छोटा करने जैसे उपाय अपनाए जा रहे हैं।
विश्लेषकों के अनुसार, एशिया अपनी कच्चा तेल आपूर्ति के लिए लगभग 60 प्रतिशत मध्य पूर्व पर निर्भर है। रूस से सस्ते तेल के आयात के बावजूद, ऊर्जा प्रणाली का सबसे संवेदनशील हिस्सा (रसोई गैस) अभी भी खतरे में है। यह युद्ध दिखाता है कि हज़ारों किलोमीटर दूर चल रहा संघर्ष कैसे वैश्विक अर्थव्यवस्था और एक संकीर्ण समुद्री मार्ग की स्थिरता से जुड़ा हुआ है।





